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हनुमानजी की अद्भुत पराक्रम भक्ति कथा🚩

हनुमानजी की अद्भुत पराक्रम भक्ति कथा🚩*

एक प्रार्थना 🙏🏻: यह कहानी बच्चों को अवश्य सुनाएं, बड़े भी इसे पढ़कर शक्ति का अनुभव करेंगे

*🕉️🌸जब रावण ने देखा कि हमारी पराजय निश्चित है तो उसने १००० अमर राक्षसों को बुलाकर रणभूमि में भेजने का आदेश दिया ! ये ऐसे थे जिनको काल भी नहीं खा सका था!*

*🌺↪️विभीषण के गुप्तचरों से समाचार मिलने पर श्रीराम को चिंता हुई कि हम लोग इनसे कब तक लड़ेंगे ? सीता का उद्धार और विभीषण का राज तिलक कैसे होगा? क्योंकि इस तरह युद्ध की समाप्ति असंभव है !*

श्रीराम की इस स्थिति से वानरवाहिनी के साथ कपिराज सुग्रीव भी विचलित हो गए कि अब क्या होगा ? हम अनंत काल तक युद्ध तो कर सकते हैं पर विजयश्री का वरण नहीं ! पूर्वोक्त दोनों कार्य असंभव हैं !

*🌼🌹अंजनानंदन हनुमान जी आकर वानर वाहिनी के साथ श्रीराम को चिंतित देखकर बोले –प्रभो !*
*क्या बात है ?*

*श्रीराम के संकेत से विभीषण जी ने सारी बात बतलाई !अब विजय असंभव है !*

पवन पुत्र ने कहा –असम्भव को संभव और संभव को असम्भव कर देने का नाम ही तो हनुमान है ! प्रभो! आप केवल मुझे आज्ञा दीजिए मैं अकेले ही जाकर रावण की अमर सेना को नष्ट कर दूँगा !

कैसे हनुमान ? वे तो अमर हैं !

प्रभो ! इसकी चिंता आप न करें सेवक पर विश्वास करें !उधर रावण ने चलते समय राक्षसों से कहा था कि वहां हनुमान नाम का एक वानर है उससे जरा सावधान रहना !

एकाकी हनुमानजी को रणभूमि में देखकर राक्षसों ने पूछा तुम कौन हो क्या हम लोगों को देखकर भय नहीं लगता जो अकेले रणभूमि में चले आये !

*🌸🌺मारुति –क्यों आते समय राक्षस राज रावण ने तुम लोगों को कुछ संकेत नहीं किया था जो मेरे समक्ष निर्भय खड़े हो ! निशाचरों को समझते देर न लगी कि ये महाबली हनुमान हैं ! तो भी क्या ? हम अमर हैं हमारा ये क्या बिगाड़ लेंगे !*

भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ पवनपुत्र की मार से राक्षस रणभूमि में ढेर होने लगे । चौथाई सेना बची थी कि पीछे से आवाज आई हनुमान हम लोग अमर हैं हमें जीतना असंभव है ! अतः अपने स्वामी के साथ लंका से लौट जावो इसी में तुम सबका कल्याण है !

आंजनेय ने कहा लौटूंगा अवश्य पर तुम्हारे कहने से नहीं !अपितु अपनी इच्छा से ! हाँ तुम सब मिलकर आक्रमण करो फिर मेरा बल देखो और रावण को जाकर बताना !

राक्षसों ने जैसे ही एक साथ मिलकर हनुमानजी पर आक्रमण करना चाहां वैसे ही पवनपुत्र ने उन सबको अपनी पूंछ में लपेटकर ऊपर आकाश में फेंक दिया !

वे सब पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति जहाँ तक है वहां से भी ऊपर चले गए ! चले ही जा रहे हैं
🆙🆙🆙⏫⏫🔝🔝🔝

चले मग जात सूखि गए गात
गोस्वामी तुलसीदास !

उनका शरीर सूख गया अमर होने के कारण मर सकते नहीं !

अतः रावण को गाली देते हुए और कष्ट के कारण अपनी अमरता को कोसते हुए अभी भी जा रहे हैं ! 🆙🆙⏫⏫🔝🔝

इधर हनुमान जी ने आकर प्रभु के चरणों में शीश झुकाया !श्रीराम बोले –क्या हुआ हनुमान ! प्रभो ! उन्हें ऊपर भेजकर आ रहा हूँ !

राघव –पर वे अमर थे हनुमान! हाँ स्वामी इसलिए उन्हें जीवित ही ऊपर भेज आया हूँ अब वे कभी भी नीचे नहीं आ सकते ? रावण को अब आप शीघ्रातिशीघ्र ऊपर भेजने की कृपा करें जिससे माता जानकी का आपसे मिलन और महाराज विभीषण का राजसिंहासन हो सके !

पवनपुत्र को प्रभु ने उठाकर गले लगा लिया ! वे धन्य हो गए अविरल भक्ति का वर पाकर ! श्रीराम उनके ऋणी बन गए !और बोले –

हनुमानजी—आपने जो उपकार किया है वह मेरे अंग अंग में ही जीर्ण शीर्ण हो जाय मैं उसका बदला न चुका सकूँ ,क्योकि उपकार का बदला विपत्तिकाल में ही चुकाया जाता है !

अंत में, श्रीराम जी के मुख से यह आशीर्वाद निकला🙌
पुत्र ! तुम पर कभी कोई विपत्ति न आये !
सुनकर निहाल हो गए आंजनेय !

हनुमानजी की वीरता के समान साक्षात काल यमराज, देवराज इन्द्र, महाराज कुबेर तथा भगवान विष्णु की भी वीरता नहीं सुनी गयी –ऐसा कथन श्रीराम का है –

*न कालस्य न शक्रस्य न विष्णर्वित्तपस्य च !*
*कर्माणि तानि श्रूयन्ते यानि युद्धे हनूमतः !*
🚩🎯🚩🎯🚩🎯🚩🎯🚩🎯
*बजरंगबली हनुमान जी की जय🙏🏻🚩*

एक सुंदर व्यक्ती म्हणून जगण्यापेक्षा एक सुंदर व्यक्तीमत्व म्हणून जगा कारण शरिराचि सुंदरता कधी ना कधी संपते पण सुंदर व्यक्तीमत्व मात्र सदैव जिवंत राहते :- रामवर्मा आसबे

एक सुंदर व्यक्ती म्हणून जगण्यापेक्षा
एक सुंदर व्यक्तीमत्व म्हणून जगा
कारण शरिराचि सुंदरता कधी ना कधी संपते
पण सुंदर व्यक्तीमत्व मात्र सदैव जिवंत राहते

रामवर्मा आसबे

एक सुंदर व्यक्ती म्हणून जगण्यापेक्षा एक सुंदर व्यक्तीमत्व म्हणून जगा कारण शरिराचि सुंदरता कधी ना कधी संपते पण सुंदर व्यक्तीमत्व मात्र सदैव जिवंत राहते :- रामवर्मा आसबे

एक सुंदर व्यक्ती म्हणून जगण्यापेक्षा
एक सुंदर व्यक्तीमत्व म्हणून जगा
कारण शरिराचि सुंदरता कधी ना कधी संपते
पण सुंदर व्यक्तीमत्व मात्र सदैव जिवंत राहते

रामवर्मा आसबे

हिन्दू धर्म में धार्मिक कार्यों में मौली ( कलावा) क्यों बांधते हैं?

*हिन्दू धर्म में धार्मिक कार्यों में मौली ( कलावा) क्यों बांधते हैं?
======================================
मोली बांधना जिसे रक्षा सूत्र भी कहते है , हर धार्मिक कार्य या पूजा के आरम्भ में तिलक के साथ यह अनिवार्य माना जाता है | इस प्रथा का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व दोनों है |
बात करे धार्मिक महत्व की तो जब भी मोली बांधी जाती है तब ज्ञानी पंडित इस मंत्र का उच्चारण करते है | तिलक लगाने के पीछे भी कई कारण है
येन बद्धो बलीराजा दावेंद्रो महाबलः !
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे माचल माचल !!
इस मंत्र का आशय है की दानवों के महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूं. हे रक्षे (रक्षा के सूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो.
शास्त्रों के अनुसार यह रक्षा सूत्र बांधने की परम्परा महान दानवीर महाराज बलि के समय से चली जन भगवान वामन ने उनकी रक्षा के लिए उनके हाथ पर यह रक्षा सूत्र बांधा था |
इसी तरह इस प्रथा को इंद्राणी शची ने देवराज इन्द्र की दाई भुजा पर रक्षा सूत्र के रूप में मोली बांधकर वृत्रासुर से युद्ध करने के लिए विदा किया था | इस रक्षा सूत्र के प्रभाव से इंद्र विजयी हुए |
अब जाने वैज्ञानिक कारण रक्षा सूत्र के प्रभाव से :
मोली का बांधना शरीर में वात पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है और शरीर स्वस्थ रहता है |
डायबीटिज , ब्लड प्रेशर, लकवा और हार्ट अटैक जैसे रोगों में मौली बांधना लाभकारी होता है |
इसके साथ ही यदि किसी यजमान के मोली बंधी हुई है और वो किसी अनुष्ठान में पूजन कर रहा हो तो सूतक का दोष लगने पर भी यह रक्षा सूत्र उस अनुष्ठान से बाधा टल जाती है |
व्यापार और घर में भी वस्तुओ पर मौली का प्रयोग
नए वाहन , नए सामान , व्यापार में कलम, बही खाते, तिजोरी , पूजन साम्रग्री आदि पर मौली बांधना शुभता और लाभ का प्रतीक माना जाता है | व्यापार में अच्छे लाभ के लिए , वाहन की सुरक्षा के लिए मौली बांधी जाती है |
मौली से जुड़े कुछ नियम
पुरुषों तथा अविवाहित कन्याओं के दाई कलाई में तथा विवाहित महिलाओं के बाई कलाई में मौली बांधा जाता है. मौली बंधाते समय हाथ में चावल रखके मुट्ठी बांधना और साथ में दूसरा हाथ सिर पर रखे |
पूजा करते समय नवीन वस्त्रों के न धारण किए होने पर मोली हाथ में धारण अवश्य करना चाहिए. धर्म के प्रति आस्था रखें. मंगलवार या शनिवार को पुरानी मौली उतारकर नई मोली धारण करें. संकटों के समय भी रक्षासूत्र हमारी रक्षा करते हैं |*

हिन्दू धर्म में धार्मिक कार्यों में मौली ( कलावा) क्यों बांधते हैं?

*हिन्दू धर्म में धार्मिक कार्यों में मौली ( कलावा) क्यों बांधते हैं?
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मोली बांधना जिसे रक्षा सूत्र भी कहते है , हर धार्मिक कार्य या पूजा के आरम्भ में तिलक के साथ यह अनिवार्य माना जाता है | इस प्रथा का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व दोनों है |
बात करे धार्मिक महत्व की तो जब भी मोली बांधी जाती है तब ज्ञानी पंडित इस मंत्र का उच्चारण करते है | तिलक लगाने के पीछे भी कई कारण है
येन बद्धो बलीराजा दावेंद्रो महाबलः !
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे माचल माचल !!
इस मंत्र का आशय है की दानवों के महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूं. हे रक्षे (रक्षा के सूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो.
शास्त्रों के अनुसार यह रक्षा सूत्र बांधने की परम्परा महान दानवीर महाराज बलि के समय से चली जन भगवान वामन ने उनकी रक्षा के लिए उनके हाथ पर यह रक्षा सूत्र बांधा था |
इसी तरह इस प्रथा को इंद्राणी शची ने देवराज इन्द्र की दाई भुजा पर रक्षा सूत्र के रूप में मोली बांधकर वृत्रासुर से युद्ध करने के लिए विदा किया था | इस रक्षा सूत्र के प्रभाव से इंद्र विजयी हुए |
अब जाने वैज्ञानिक कारण रक्षा सूत्र के प्रभाव से :
मोली का बांधना शरीर में वात पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है और शरीर स्वस्थ रहता है |
डायबीटिज , ब्लड प्रेशर, लकवा और हार्ट अटैक जैसे रोगों में मौली बांधना लाभकारी होता है |
इसके साथ ही यदि किसी यजमान के मोली बंधी हुई है और वो किसी अनुष्ठान में पूजन कर रहा हो तो सूतक का दोष लगने पर भी यह रक्षा सूत्र उस अनुष्ठान से बाधा टल जाती है |
व्यापार और घर में भी वस्तुओ पर मौली का प्रयोग
नए वाहन , नए सामान , व्यापार में कलम, बही खाते, तिजोरी , पूजन साम्रग्री आदि पर मौली बांधना शुभता और लाभ का प्रतीक माना जाता है | व्यापार में अच्छे लाभ के लिए , वाहन की सुरक्षा के लिए मौली बांधी जाती है |
मौली से जुड़े कुछ नियम
पुरुषों तथा अविवाहित कन्याओं के दाई कलाई में तथा विवाहित महिलाओं के बाई कलाई में मौली बांधा जाता है. मौली बंधाते समय हाथ में चावल रखके मुट्ठी बांधना और साथ में दूसरा हाथ सिर पर रखे |
पूजा करते समय नवीन वस्त्रों के न धारण किए होने पर मोली हाथ में धारण अवश्य करना चाहिए. धर्म के प्रति आस्था रखें. मंगलवार या शनिवार को पुरानी मौली उतारकर नई मोली धारण करें. संकटों के समय भी रक्षासूत्र हमारी रक्षा करते हैं |*

The …E… life

*Beautiful message – -* Please do read it – 😃

The …E… life !!!!!

In this world of E-mails, E-ticket, E-paper, E-recharge, E-transfer and the latest E-Governance..E- commerce.

Never Forget “E-shwar ( God )”

who makes e-verything e-asy for e-veryone e-veryday.

“E” is the most Eminent letter of the English alphabet.

Men or Women don’t exist without “E”.

House or Home can’t be made without “E”.

Bread or Butter can’t be found without “E”.

“E” is the beginning of “existence” and the end of “trouble.”

It’s not at all in ‘war’
but twice in ‘peace’.

It’s once in ‘hell’ but twice in ‘heaven’.

“E” represented in ‘Emotions’
Hence, all emotional relations like Father, Mother, Brother, Sister,wife & friends have ‘e’ in them.

“E” also represents ‘Effort’ & ‘Energy’
Hence to be ‘Better’ from good two “e”s are added in better.

Without “e”, we would have no love, life, wife, friends or hope

& ‘see’, ‘hear’, ‘smell’, or ‘taste’ as ‘eye’ ‘ear’, ‘nose’ & ‘tongue’ are incomplete without “e”.

Finally no ‘Life’ & ‘Death’ without “e”.

Hence GO with “E”
but without E-GO.
👍

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Bread or Butter can’t be found without “E”.

“E” is the beginning of “existence” and the end of “trouble.”

It’s not at all in ‘war’
but twice in ‘peace’.

It’s once in ‘hell’ but twice in ‘heaven’.

“E” represented in ‘Emotions’
Hence, all emotional relations like Father, Mother, Brother, Sister,wife & friends have ‘e’ in them.

“E” also represents ‘Effort’ & ‘Energy’
Hence to be ‘Better’ from good two “e”s are added in better.

Without “e”, we would have no love, life, wife, friends or hope

& ‘see’, ‘hear’, ‘smell’, or ‘taste’ as ‘eye’ ‘ear’, ‘nose’ & ‘tongue’ are incomplete without “e”.

Finally no ‘Life’ & ‘Death’ without “e”.

Hence GO with “E”
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👍

लक्ष्य_प्राप्ति_की_राह

🌳🦚 *#लक्ष्य_प्राप्ति_की_राह*💐💐
💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥👇
एक किसान के घर एक दिन उसका कोई परिचित मिलने आया। उस समय वह घर पर नहीं था।

उसकी पत्नी ने कहा: वह खेत पर गए हैं। मैं बच्चे को बुलाने के लिए भेजती हूं। तब तक आप इंतजार करें।

कुछ ही देर में किसान खेत से अपने घर आ पहुंचा। उसके साथ-साथ उसका पालतू कुत्ता भी आया।

कुत्ता जोरों से हांफ रहा था। उसकी यह हालत देख, मिलने आए व्यक्ति ने किसान से पूछा… क्या तुम्हारा खेत बहुत दूर है ?

किसान ने कहा: नहीं, पास ही है। लेकिन आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं ?

उस व्यक्ति ने कहा: मुझे यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि तुम और तुम्हारा कुत्ता दोनों साथ-साथ आए…

लेकिन तुम्हारे चेहरे पर रंच मात्र थकान नहीं जबकि कुत्ता बुरी तरह से हांफ रहा है।

किसान ने कहा: मैं और कुत्ता एक ही रास्ते से घर आए हैं। मेरा खेत भी कोई खास दूर नहीं है। मैं थका नहीं हूं। मेरा कुत्ता थक गया है।

इसका कारण यह है कि मैं सीधे रास्ते से चलकर घर आया हूं, मगर कुत्ता अपनी आदत से मजबूर है।

वह आसपास दूसरे कुत्ते देखकर उनको भगाने के लिए उसके पीछे दौड़ता था और भौंकता हुआ वापस मेरे पास आ जाता था।

फिर जैसे ही उसे और कोई कुत्ता नजर आता, वह उसके पीछे दौड़ने लगता।

अपनी आदत के अनुसार उसका यह क्रम रास्ते भर जारी रहा। इसलिए वह थक गया है।

देखा जाए तो यही स्थिति आज के इंसान की भी है।

जीवन के लक्ष्य तक पहुंचना यूं तो कठिन नहीं है, लेकिन राह में मिलने वाले कुत्ते, व्यक्ति को उसके जीवन की सीधी और सरल राह से भटका रहे हैं।

इंसान अपने लक्ष्य से भटक रहा है और यह भटकाव ही इंसान को थका रहा है।

यह लक्ष्य प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है। आपकी ऊर्जा को रास्ते में मिलने वाले कुत्ते बर्बाद करते है।

भौंकने दो इन कुत्तो को और लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में सीधे बढ़ते रहो.. फिर एक ना एक दिन मंजिल मिल ही जाएगी।

लेकिन इनके चक्कर में पड़ोगे तो थक ही जाओगे। अब ये आपको सोचना है कि किसान की तरह सीधी राह चलना है या उसके कुत्ते की तरह।

सफलता के लिए सही समय कि नहीं,सही निर्णय की जरूरत होती है।

प्रेम दुर्लभ है उसे पकड़ कर रखें, क्रोध बहुत खराब है, उसे दबाकर रखें। भय बहुत भयानक है, उसका सामना करें, स्मृतियाँ बहुत सुखद है उन्हें संजोकर रखें।

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।
🌳🌳🙏🙏🙏🌳🌳🙏🙏🙏🌳🌳

अपना मान भले टल जाए, भक्त का मान ना टलने देना.

*🌹अपना मान भले टल जाए, भक्त का मान ना टलने देना…..🌹🙏*

एक समय श्री रंगनाथ मंदिर के महंत जो की प्रभु के बहुत प्रिय भक्त भी थे, अपने कुछ शिष्यों को साथ लेकर दक्षिण में तीर्थ दर्शन करते हुए एक नगर में पहुंचे। संध्या का समय था, मार्ग में बहुत ही रमणीय उपवन देख महंत जी का मन हुआ यही कुछ देर विश्राम कर, भोजन प्रसाद बनाकर हरिनाम संकीर्तन किया जाये।

संयोग से वह स्थान एक वेश्या का था, वेश्या वही पास के भवन में रहती थी। महंत जी और उनके शिष्यों को इस बात का पता नहीं था कि जिस जगह वह रुके हैं, विश्राम व भोजन प्रसादी कर रहे हैं वो स्थान एक वेश्या का है। वेश्या भी दूर से अपने भवन से हरि भक्तो की क्रियाओं का आनंद ले रही थी।

द्वार पर बहुत सुन्दर-सुन्दर श्वेत वस्त्र धारण किये हुए, अपने साथ अपने ठाकुर जी को भी लाये, आज मानो संतो के प्रभाव मात्र से पापआसक्त उस वेश्या के ह्रदय में भी प्रभु का प्रेम प्रस्फुटित हो रहा हो। स्वयं को बड़भागी जान उसने संतो को विघ्न न हो ये जानकर तथा अपने बारे में कुछ न बताकर दूर से ही अपने भवन से ठाकुर जी के दर्शनों का आनंद लेती रही।

जब सभी संतो का भोजन प्रसाद व संकीर्तन समाप्त हुआ तो अंत में वह वेश्या ने एक थाल में बहुत सारी स्वर्ण मुद्राएँ लेकर महंत जी के समक्ष प्रस्तुत हुई और महंत जी को प्रणाम किया व बताया की ये स्थान मेरा ही है, मैं यहाँ की मालकिन हुँ। महंत जी को बड़ी प्रसन्नता हुई ये जानकर और आभार व्यक्त करते हुए उन्होंने भी कहा की यह बहुत ही रमणीय स्थान है, हमारे ठाकुर जी को भी बड़ा पसंद आया है यह स्थान, संकीर्तन में भी बड़ा मन लगा।

अब वेश्या ने वो स्वर्ण से भरा हुआ थाल महंतजी की सेवा में प्रस्तुत किया। सचे संतो का स्वाभाव होता है वो बिना जाने किसी भी अयोग्य व्यक्ति का धन या सेवा नहीं लेते हैं, और शास्त्र भी अनुमति नहीं देता है। अतः महंत जी ने उस वेश्या से कहा हम बिना जाने ये धन स्वीकार नहीं कर सकते, आपने किस तरह से यह धन अर्जित किया है?

वेश्या ने भी द्वार पर आये संतो से झूठ न कहकर सारी बात सच-सच बता दी की, मैं एक वेश्या हूँ, समाज के आसक्त पुरुषों को रिझाती हूँ, उसी से मैंने यह धन अर्जित किया है। इतना कहकर वह महंत जी के चरणों में पूर्ण समर्पण करते हुए फुट-फुट कर रोने लगी, व महंतजी से श्री ठाकुरजी की भक्ति का दान देने का अनुग्रह करने लगी।

महंत जी को भी दया आयी उसके इस अनुग्रह पर, लेकिन वे बड़े धर्म संकट में पड़ गये, यदि वेश्या का धन स्वीकार किया तो धर्म की हानि होगी और यदि शरण में आये हुए को स्वीकारा नहीं, मार्ग नहीं दिखाया तो भी संत धर्म की हानि।

अब महंत जी ने अपने रंगनाथ जी का ध्यान किया और उन्ही को साक्षी कर वेश्या के सामने शर्त रखी और कहा हम तो ये धन स्वीकार नहीं कर सकते यदि तुम ह्रदय से अपने इस बुरे कर्म को छोड़ना ही चाहती हो तो ऐसा करो इस पाप कर्म से अर्जित की हुई सारी संपत्ति को तुरंत बेचकर जो धन आये उससे हमारे रंगनाथ जी के लिए सुन्दर सा मुकुट बनवाओ।

यदि हमारे प्रभु वह मुकुट स्वीकार कर ले तो समझ लेना उन्होंने तुम्हे माफ़ करके अपनी कृपा प्रदान की है।

वेश्या का मन तो पहले ही निर्मल हो चूका था, महंत जी की आज्ञा शिरोधार्य कर तुरंत ही सम्पूर्ण संपत्ति बेचकर उसने रंगनाथ जी के लिये ३ लाख रुपये का सुन्दर मुकुट बनवाया। कुछ ही दिनों में वेश्या ने मुकुट बनवाकर अपने नगर से महंत जी के साथ रंगनाथ जी मंदिर के लिये प्रस्थान किया।

मंदिर पहुंचते ही जब यह बात समस्त ग्रामवासीयों और मंदिर के पुजारियों को पता चली की अब वेश्या के धन से अर्जित मुकुट रंगनाथजी धारण करेंगे तो सभी अपना-अपना रोष व्यक्त करने लगे, और महंत जी और उस वेश्या का मजाक उड़ाने लगे। महंत जी सिद्ध पुरुष थे और रंगनाथजी के सर्वविदित प्रेमी भक्त भी थे तो किसी ने उनका विरोध करने की चेष्ठा नहीं की।

अब देखिये जैसे ही वो वेश्या मंदिर में प्रवेश करने लगी, द्वार तक पहुंची ही थी की पूर्व का पाप बीच में आ गया, वेश्या वहीं “रजस्वला” हो गई… माथा पीट लिया अपना, फुट फुटकर रोने लगी, मूर्छित होके भूमि पे गिर पड़ी। हाय महा-दुःख, संत की कृपा हुई, रंगनाथ जी का अनुग्रह प्राप्त होने ही वाला था की रजस्वला हो गई, मंदिर में जाने लायक ही न रही।

सब लोग हसीं उड़ाने लगे, पुजारी भी महंत जी को कोसने लगे।

अब महंत जी भी क्या करते, उन्होंने वेश्या के हाथ से मुकुट लेकर स्वयं रंगनाथ जी के गर्भगृह प्रवेश कर श्री रंगनाथ जी को मुकुट पहनाने लगे। इधर महंत जी बार-बार मुकुट प्रभु के मस्तक पर धराए और रंग जी धारण ही ना करें, मुकुट बार-बार रंगनाथ जी के मस्तक से गिर जाये।

अब तो महंत जी भी निराश हो गये सोचने लगे हमसे ही बहुत बड़ा अपराध हुआ है, शायद प्रभु ने उस वेश्या को स्वीकार नहीं किया, इस लिये ठाकुर जी मुकुट धारण नहीं कर रहे हैं।

अपने भक्त को निराश देखकर रंगनाथ जी से रहा नहीं गया।

अपने श्री विग्रह से ही बोल पड़े: बाबा आप निराश मत हों, हमने तो उसी दिन उस वेश्या को स्वीकार कर लिया था जिस दिन आपने उसे आश्वासन देकर हमारे लिए मुकुट बनवाने को कहा था।

महंतजी ने बोला: प्रभु जब स्वीकार कर ही लिया है तो फिर उस बेचारी का लाया हुआ मुकुट धारण क्यों नहीं कर रहे हैं?

रंगनाथ जी बोले मुकुट तो हम उसी वेश्या के हाथ से धारण करेंगे, इतने प्रेम से लायी है तो पहनेगे भी उसी के हाथ से, उसे तो तू बाहर ही छोड़कर आ गया और खुद मुकुट पहना रहा है मुझको!

महंत जी ने कहा: प्रभु जी वो रजस्वला है, वो मंदिर में नहीं प्रवेश कर सकती।

अब तो रंगनाथ जी जिद करने लगे, इसी समय लाओ हम तो उसी के हाथ से पहनेंगे मुकुट।

मंदिर के समस्त पुजारियों ने प्रभु की ये आज्ञा सुन दाँतो तले उंगलिया दबा ली, सब विस्मित से हो गये, सम्पूर्ण मंदिर में हाहाकार मच गया, जिसने सुना वो अचंभित हो गया। रंगनाथ जी की आज्ञा को शिरोधार्य कर सैकड़ो लोगो की उपस्थिति में उस वेश्या को सम्मान पूर्वक मंदिर में प्रवेश करवाया गया।

अपने हाथो से वेश्या रंगनाथ जी को मुकुट धारण कराने लगी, नैनो से अविरल अश्रु की धाराऐं बह रही थी। कितनी अद्भुत दशा हुई होगी… ज़रा सोचो! रंगनाथ जी भक्त की इसी दशा का तो आनंद ले रहे थे।

रंगनाथ जी का श्री विग्रह बहुत बड़ा होने के कारण ऊपर चढकर मुकुट पहनाना पड़ता है, भक्त के अश्रु से प्रभु के सम्पूर्ण मुखारविंद का मानो अभिषेक हो गया। वेश्या के मुख से शब्द नहीं निकल रहे, नयन अविरल अश्रु बहा रहे है, अवर्णीय दशा है।

आज रंगनाथ जी ने उस प्रेम स्वरुप भेट स्वीकार करने हेतु अपना मस्तक नीचे झुका दिया और मुकुट धारण कर उस वेश्या को वो पद प्रदान किया जिसके लिए बड़े-बड़े देवता, संत-महात्मा हजारो वर्ष तप-अनुष्ठान करते हैं पर उन महाप्रभु का अनुग्रह प्राप्त करने में असमर्थ रहते हैं।

कोटि-कोटि वंदन है ऐसे संत को जो उस अन-अधिकारी वेश्या पर अनुग्रह कर श्री गोविंद के चरणों का अनुसरण करवाया!

वास्तव में प्रभु का ये ही शाश्वत सत्य स्वरुप है, सिर्फ और सिर्फ प्रेम से ही रिझते हैं, लाख जतन करलो, हजारो नियम कायदे बनालो परन्तु यदि भाव पूर्ण भक्ति नहीं है तो सब व्यर्थ है।

दीनदयाल, करुणानिधान प्रभु तक जब किसी भक्त की करुणा पुकार पहुंचती है तो अपने आप को रोक नहीं पाते और दौड़े चले आते हैं निजभक्त के पास।

प्रभु तो स्वयं प्रेम की डोरी में स्वयं बंधने के लिए तत्पर रहते हैं परन्तु उन्हें निश्चल प्रेम में बांधने वाला कोई विरला ही होता है।
जय श्री राधे कृष्णा।🙏

ईर्षा.

*ईर्षा……*

एकदा ब्रह्मदेव रथातून जात असताना सारथी अचानक रथ थांबवतो. ब्रह्मदेवाने कारण विचारले असता तो सांगतो की एक छोटा प्राणी बसला आहे तो रस्त्यातून बाजूला होत नाही म्हणून रथ थांबवावा लागला

त्याला बाजूला होण्याची विनंती कर. थोड्या वेळाने ब्रह्मदेवाने पुन्हा विचारल्यावर सारथ्याने सांगितले की तो प्राणी पूर्वी होता त्यापेक्षा मोठा झाला आहे.

ब्रह्मदेवाने सांगितले की त्याला चाबूक दाखव म्हणजे तो बाजूला जाईल.

ब्रह्मदेवाने पुन्हा विचारल्यावर कळले की तो प्राणी अधिकच मोठा झाला आहे. आता तो प्राणी तर एका डोंगराएवढा मोठा झाला आहे आणि रथावर चाल करून येत आहे. हे ऐकताच ब्रह्मदेव म्हणाले रथ मागे घे आणि त्याला सांग की, *’तूच श्रेष्ठ आहेस, आम्ही रथ वळवतो आणि दुसऱ्या मार्गाने जातो’.* सारथ्याने हे सांगितल्यावर तो प्राणी एकदम मुंगी इतका छोटा झाला आणि रस्त्यातून बाजूला झाला. आश्चर्यचकित झालेल्या सारथ्याने ब्रह्मदेवास याचे कारण विचारता देवाने सांगितले की ‘त्या प्राण्याचे नाव इर्षा असे होते. आपण जेवढे महत्व त्याला देऊ तेवढा तो मोठा होत जाईल. मात्र आपण स्पर्धेतून दूर झाल्यावर इर्षा राहिली नाही आणि तो सामान्य स्वरुपात आला.’

सर्वच स्पर्धा ह्या जिंकण्यासाठी खेळायच्या नसतात. काहीवेळा फालतू स्पर्धेत भाग घेतल्यामुळे उगाच उर्जा व्यर्थ खर्च होते. काहीवेळा नमते घेतल्यामुळे फायदाच होतो. याचप्रमाणे जग लोकाच्या नजरेने बघण्यापेक्षा आपल्या नजरेने बघावे. आपण सुखी आहोत याची पावती लोकांकडून घेण्यापेक्षा आपले सुख आपणच अनुभवावे.

आपला निर्णय आपण घ्यावा आणि त्यास जबाबदार राहावे … लोकं काय म्हणतील याचा फार विचार करू नये कारण एक न एक दिवस जेव्हा चितेवर पडलो असू तेव्हा एका प्रमाणापेक्षा कोणीही आपल्याला जवळ करणार नाही तेव्हा आपले सुख दुःख आपणच अनुभवावे….. आयुष्य तणावमुक्त होते.
यालाच वास्तव जीवन जगण्याची कला म्हणतात.

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