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भगवान विष्णु के चरणों से निकला अमृत है गंगा

भगवान विष्णु के चरणों से निकला अमृत है गंगा!!!!!

नीराकार ब्रह्म अर्थात् जलरूप ब्रह्म या द्रवरूप में ब्रह्म***

कोई ‘नराकार ब्रह्म’ (राम, कृष्ण) को भजता है , तो कोई ‘निराकार ब्रह्म’ को; परन्तु कलियुग में मनुष्य के पाप-तापों की शान्ति ‘नीराकार ब्रह्म’ से ही होती है ।

हिन्दी में ‘नीर’ जल को कहते हैं । ‘द्रव’ तरल पदार्थ को कहते हैं । अत:नीराकार ब्रह्म का अर्थ है ‘भगवान का जलमय रूप’ और यह रूप है मां गंगा ।

मनुष्यों के तापों की शान्ति के लिए ब्रह्म का द्रवरूप होना!!!!!

गंगा को ‘ब्रह्मद्रव’ भी कहते हैं । ‘ब्रह्मद्रव’ का अर्थ है—आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक (शारीरिक, मानसिक और भौतिक)—इन तीनों तापों से पीड़ित मनुष्यों की दशा से परमात्मा (ब्रह्म) का द्रवित होकर उनके तापों की शान्ति के लिए जल रूप में अवतरित होना । ताप चाहे कैसा भी हो उसकी शान्ति जल से ही होती है ।

गंगा का एक नाम ‘ब्रह्माम्बु’ है । अम्बु जल को कहते हैं, इसलिए ब्रह्म + अम्बु अर्थात् जलरूप ब्रह्म ।

भगवान की प्रत्येक लीला के पीछे लोककल्याण ही छिपा होता है । भगवान के जलमय रूप होने के पीछे भी कलियुग में मानव का कल्याण ही छिपा है । यदि गंगा का धरती पर अवतरण न हुआ होता तो कलियुग में मनुष्यों के पापों का मल कैसे धुलता?

भगवान विष्णु का चरणामृत है गंगा!!!!!

आदिकवि वाल्मीकि ने अपने ‘गंगाष्टक’ में गंगा को ‘मुरारि का चरणामृत’ कहा है । अपने प्रभु विष्णु का चरणामृत जानकर भगवान शंकर ने ब्रह्मस्वरूपिणी गंगा को अपने मस्तक पर धारण किया है । कवि रसखान ने तो यहां तक कह दिया कि गंगा समस्त व्याधियों की सर्वोत्तम औषधि है इसीलिए भगवान शंकर अपने मस्तक पर स्थित गंगा के भरोसे ही आक-धतूरे चबाते रहते हैं और उन्हीं के भरोसे उन्होंने हलाहल विष का पान कर लिया—

‘आक धतूरो चबात फिरैं,
विष खात फिरैं सिव तोरे भरोसे ।।

भगवान की विभूति है गंगा!!!!!!

गंगा भगवान के चरणों से उत्पन्न हुई है, विष्णुपदी है, उसका महत्व केवल इतना ही नहीं है; अपितु गंगा साक्षात् परमात्मा की विभूति है । भगवान श्रीकृष्ण ने गीता (१०।३१) में गंगा को अपना स्वरूप बतलाते हुए कहा है—‘स्तोत्रसामस्मि जाह्नवी ।’

गंगा ब्रह्मजल है, उसमें भगवान के गुण होने के कारण वह सदैव शुद्ध, पवित्र व निर्विकार रहने वाला दिव्य पदार्थ है । इसीलिए वह शारीरिक व मानसिक रोगों को दूर करने व सांसारिक भोगों के साथ मोक्ष प्रदान करने की भी क्षमता रखता है—

गंग सकल मुद मंगल मूला ।
सब सुख करनि हरनि सब सूला ।। (राचमा २।८७।४)

गंगा के द्रवरूप में आविर्भाव की कथाएं!!!!!

वास्तव में गंगा गोलोक या विष्णुलोक में भगवान श्रीहरि की ही एक स्वरूपाशक्ति हैं । गंगा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पुराणों में अनेक कथाएं है । यहां गंगा के नीराकार ब्रह्मस्वरूप को दर्शाती दो पौराणिक कथाओं का उल्लेख किया जा रहा है ।

ब्रह्मवैवर्तपुराण (प्रकृतिखण्ड) में गंगा की द्रवरूप में उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है—

श्रीराधाकृष्ण का जलरूप है गंगा!!!!!!

एक बार गोलोक में श्रीकृष्ण कार्तिक पूर्णिमा के दिन रासमहोत्सव मना रहे थे । रासमण्डल में श्रीकृष्ण श्रीराधा की पूजा कर विराजमान थे । उसी समय श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए सरस्वती प्रकट हुईं और उन्होंने अपनी मधुर स्वरलहरी में गीत गाकर और दिव्य वीणा के वादन से सारा वातावरण झंकृत कर दिया ।

उसी समय भगवान शंकर भी श्रीकृष्ण सम्बन्धी सरस पद गाने लगे । उसे सुनकर सभी देवगण मूर्छित हो गए । जब उनकी चेतना लौटी तब वहां श्रीराधाकृष्ण के स्थान पर सारे रासमण्डल में जल-ही-जल फैला हुआ था । सभी गोप-गोपी और देवगण भगवान श्रीराधाकृष्ण को न पाकर विलाप करते हुए उनसे पुन: प्रकट होने की प्रार्थना करने लगे ।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने आकाशवाणी द्वारा कहा—‘मैं सर्वात्मा श्रीकृष्ण और मेरी स्वरूपाशक्ति श्रीराधा—हम दोनों ने ही भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए यह जलमय विग्रह (नीराकार स्वरूप) धारण कर लिया है ।’

यदि कोई मनुष्य गंगा का जल हाथ में लेकर प्रतिज्ञा करेगा और फिर उस अपनी की हुई प्रतिज्ञा का पालन नहीं करेगा वह नरक का भागी होगा ।

वे ही पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण और राधा जलरूप होकर गंगा बन गए और वह दिव्य जलराशि ही ‘देवनदी’ गंगा के नाम से प्रसिद्ध हुई । गोलोक से प्रकट होने वाली गंगा का यही रहस्य है ।

श्रीमद्देवीभागवत में गंगा के ब्रह्मद्रव रूप में आविर्भाव की कथा!!!!!!

दक्षकन्या सती के देहत्याग करने पर जब भगवान शिव तप करने लगे, तब देवताओं ने जगन्माता की स्तुति कर उनसे दोबारा भगवान शंकर का वरण करने की प्रार्थना की । देवी ने तब प्रसन्न होकर कहा—‘मैं दो रूपों में पर्वतराज हिमालय और मैना के घर प्रकट होऊंगी ।’ पहले वे अपने अंश रूप से वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को गंगा रूप में प्रकट हुईं फिर पूर्णावतार धारणकर पार्वती के रूप में प्रकट हुईं ।

हिमालय के घर में सती का अंशावतार गंगा के रूप में प्रकट होने पर ब्रह्मा आदि देवताओं ने सोचा कि सती के छायाशरीर को लेकर जब शिवजी ताण्डव कर रहे थे तो उनके पैरों के आघात से पृथ्वी रसातल में जाने लगी । जगत की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने चक्र से छायासती के शरीर के टुकड़े कर दिए थे, उस अपराध के कारण भगवान शिव अभी तक हमसे रुष्ट हैं । यदि हम गंगा को शिवजी को प्रदान कर दें तो वे हमसे अवश्य प्रसन्न हो जाएंगे । जैसे छायासती भगवान शिव के सिर पर स्थित रहीं वैसे ही ये गंगा जलरूप में उनके सिर पर सुशोभित रहेंगी ।
डॉ0 विजय शंकर मिश्र:

गंगा की ब्रह्मलोक से भूलोक तक की यात्रा!!!!!!

ब्रह्माजी सहित सभी देवगण हिमालय के घर गंगा को मांगने के लिए पहुंच गए और उन्हें सारी बात बता दी । गिरिसुता गंगा पिता की आज्ञा से सदाशिव को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए ब्रह्माजी के कमण्डलु में निराकार रूप से स्थित हो कर स्वर्गलोक में आ गयीं । जब उनकी माता मैना को यह बात पता चली तो उन्होंने गुस्से में शाप देते हुए कहा—‘माता से बिना बात किए तुम स्वर्ग चलीं गयीं, इसलिए तुम्हें जलरूप में पुन: पृथ्वी पर आना होगा ।’

ब्रह्माजी ने मूर्तिमान गंगा को शंकरजी को दे दिया और वे शंकरजी के साथ कैलास चली गयीं । ब्रह्माजी की प्रार्थना पर एक अंश से वे निराकार रूप में उनके कमण्डलु में स्थित हो गयीं और ब्रह्माजी उन्हें ब्रह्मलोक में ले गए ।

गंगा के शंकरजी के साथ विवाह की बात सुनकर भगवान विष्णु ने उन्हें वैकुण्ठ में बुलाया । भगवान शंकर गंगाजी सहित वैकुण्ड में पधारे । भगवान विष्णु के आग्रह पर वे सुन्दर पदों का गान करने लगे । वे जो रागिनी गाते वही मूर्तिमान होकर प्रकट हो जाती ।

भगवान शंकर के गायन से भगवान विष्णु हुए द्रवरूप!!!!!!

भगवान शंकर के ‘श्री’ नामक रागिनी के गाने से मुग्ध होकर भगवान विष्णु स्वयं रसरूप होकर बहने लगे । ब्रह्माजी ने देखा कि स्वयं ब्रह्म भी इस समय द्रवीभूत हो गए हैं; अत: उन्होंने वह जल भी अपने कमण्डलु में रख लिया । ब्रह्मद्रव से कमण्डलु के जल का स्पर्श होते ही सारा जल गंगाजी में मिल गया और निराकारा गंगाजी जलमयी हो गयीं ।

इसके बाद वामन अवतार में जब भगवान विष्णु ने विराट् रूप धारण कर अपने एक पग से बलि की सारी पृथ्वी नाप ली, शरीर से आकाश और भुजाओं से दिशाएं घेर लीं, दूसरे पग से उन्होंने स्वर्ग को भी नाप लिया, तब भगवान द्वारा उठाया गया चरण महर्लोक, जनलोक और तपलोक को पारकर सत्यलोक में पहुंच गया ।

उनके उठे हुए चरण के अंगूठे के नख से ब्रह्माण्ड फट गया । वहां से निकले जल को ब्रह्माजी ने अपने कमण्डलु में ले लिया। ब्रह्माजी ने कमण्डलु के उसी जल से भगवान के चरण को स्नान कराया। कमण्डलु का जल देते ही वह चरण वहीं स्थिर हो गया । ब्रह्मा के कमण्डलु का वही जल विष्णुजी के पांव पखारने से गंगा के रूप में परिणत हो गया और वे ‘विष्णुपदी’, ‘नारायणी’, ‘वैष्णवी’ व ‘सुरसरि’ नाम से भी जानी जाने लगीं ।

गंगा का मूल मन्त्र है—‘ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नम: ‘ अर्थात् विष्णु सभी देवों का प्रतिनिधित्व करते हैं और नारायणी गंगा भगवान विष्णु का ।
डॉ0 विजय शंकर मिश्र:

भगवान शंकर बन गए ‘गंगाधर’!!!!!!

अंत में भागीरथ की तपस्या के फलस्वरूप गंगा का अवतरण जब धरती पर होने लगा तो उस समय का बहुत ही सुन्दर वर्णन भगवान व्यासजी ने महाभारत के वनपर्व में किया है—

‘शंकरजी अपनी जटा फैलाकर खड़े हैं । शंकरजी को खड़े देखकर आकाश से एकाएक गंगाजी गिरीं । उनमें बहुत-सी मछलियां और घड़ियाल खलबलाहट पैदा कर रहे थे । आकाश में करधनी सी मालूम पड़ने वाली उस गंगा को शंकरजी ने सिर पर यों धारण किया, जैसे मोती की माला धारण की हो ।’

भगवान के चरणों तक पहुंचाने वाली शक्ति का नाम है गंगा!!!!!

गंगा शिवजी की जटाओं में बस गयीं और उसमें से बाहर न निकल सकी । राजा भगीरथ की प्रार्थना पर शिवजी ने जब अपनी जटा का एक बाल खोलकर गंगा को बाहर निकाला तो लोकमंगल को उतावली गंगा भगीरथ के रथ के पीछे चल पड़ीं और कपिलमुनि के आश्रम में जाकर राजा सगर के भस्मसात् पुत्रों को जैसे ही गंगाजी ने स्पर्श किया वे मुक्त होकर स्वर्ग पहुंच गए ।

भगवान विष्णु के पद (चरण) से निकली गंगा भगवान विष्णु के पद (लोक) को ही प्रदान कर देती हैं ।

गंगा, गीता, गायत्री, गणपति, गौरि, गुपाल ।
प्रातकाल जो नर भजैं, ते न परैं भव-जाल ।।

भगवान विष्णु के चरणों से निकला अमृत है गंगा

भगवान विष्णु के चरणों से निकला अमृत है गंगा!!!!!

नीराकार ब्रह्म अर्थात् जलरूप ब्रह्म या द्रवरूप में ब्रह्म***

कोई ‘नराकार ब्रह्म’ (राम, कृष्ण) को भजता है , तो कोई ‘निराकार ब्रह्म’ को; परन्तु कलियुग में मनुष्य के पाप-तापों की शान्ति ‘नीराकार ब्रह्म’ से ही होती है ।

हिन्दी में ‘नीर’ जल को कहते हैं । ‘द्रव’ तरल पदार्थ को कहते हैं । अत:नीराकार ब्रह्म का अर्थ है ‘भगवान का जलमय रूप’ और यह रूप है मां गंगा ।

मनुष्यों के तापों की शान्ति के लिए ब्रह्म का द्रवरूप होना!!!!!

गंगा को ‘ब्रह्मद्रव’ भी कहते हैं । ‘ब्रह्मद्रव’ का अर्थ है—आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक (शारीरिक, मानसिक और भौतिक)—इन तीनों तापों से पीड़ित मनुष्यों की दशा से परमात्मा (ब्रह्म) का द्रवित होकर उनके तापों की शान्ति के लिए जल रूप में अवतरित होना । ताप चाहे कैसा भी हो उसकी शान्ति जल से ही होती है ।

गंगा का एक नाम ‘ब्रह्माम्बु’ है । अम्बु जल को कहते हैं, इसलिए ब्रह्म + अम्बु अर्थात् जलरूप ब्रह्म ।

भगवान की प्रत्येक लीला के पीछे लोककल्याण ही छिपा होता है । भगवान के जलमय रूप होने के पीछे भी कलियुग में मानव का कल्याण ही छिपा है । यदि गंगा का धरती पर अवतरण न हुआ होता तो कलियुग में मनुष्यों के पापों का मल कैसे धुलता?

भगवान विष्णु का चरणामृत है गंगा!!!!!

आदिकवि वाल्मीकि ने अपने ‘गंगाष्टक’ में गंगा को ‘मुरारि का चरणामृत’ कहा है । अपने प्रभु विष्णु का चरणामृत जानकर भगवान शंकर ने ब्रह्मस्वरूपिणी गंगा को अपने मस्तक पर धारण किया है । कवि रसखान ने तो यहां तक कह दिया कि गंगा समस्त व्याधियों की सर्वोत्तम औषधि है इसीलिए भगवान शंकर अपने मस्तक पर स्थित गंगा के भरोसे ही आक-धतूरे चबाते रहते हैं और उन्हीं के भरोसे उन्होंने हलाहल विष का पान कर लिया—

‘आक धतूरो चबात फिरैं,
विष खात फिरैं सिव तोरे भरोसे ।।

भगवान की विभूति है गंगा!!!!!!

गंगा भगवान के चरणों से उत्पन्न हुई है, विष्णुपदी है, उसका महत्व केवल इतना ही नहीं है; अपितु गंगा साक्षात् परमात्मा की विभूति है । भगवान श्रीकृष्ण ने गीता (१०।३१) में गंगा को अपना स्वरूप बतलाते हुए कहा है—‘स्तोत्रसामस्मि जाह्नवी ।’

गंगा ब्रह्मजल है, उसमें भगवान के गुण होने के कारण वह सदैव शुद्ध, पवित्र व निर्विकार रहने वाला दिव्य पदार्थ है । इसीलिए वह शारीरिक व मानसिक रोगों को दूर करने व सांसारिक भोगों के साथ मोक्ष प्रदान करने की भी क्षमता रखता है—

गंग सकल मुद मंगल मूला ।
सब सुख करनि हरनि सब सूला ।। (राचमा २।८७।४)

गंगा के द्रवरूप में आविर्भाव की कथाएं!!!!!

वास्तव में गंगा गोलोक या विष्णुलोक में भगवान श्रीहरि की ही एक स्वरूपाशक्ति हैं । गंगा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पुराणों में अनेक कथाएं है । यहां गंगा के नीराकार ब्रह्मस्वरूप को दर्शाती दो पौराणिक कथाओं का उल्लेख किया जा रहा है ।

ब्रह्मवैवर्तपुराण (प्रकृतिखण्ड) में गंगा की द्रवरूप में उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है—

श्रीराधाकृष्ण का जलरूप है गंगा!!!!!!

एक बार गोलोक में श्रीकृष्ण कार्तिक पूर्णिमा के दिन रासमहोत्सव मना रहे थे । रासमण्डल में श्रीकृष्ण श्रीराधा की पूजा कर विराजमान थे । उसी समय श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए सरस्वती प्रकट हुईं और उन्होंने अपनी मधुर स्वरलहरी में गीत गाकर और दिव्य वीणा के वादन से सारा वातावरण झंकृत कर दिया ।

उसी समय भगवान शंकर भी श्रीकृष्ण सम्बन्धी सरस पद गाने लगे । उसे सुनकर सभी देवगण मूर्छित हो गए । जब उनकी चेतना लौटी तब वहां श्रीराधाकृष्ण के स्थान पर सारे रासमण्डल में जल-ही-जल फैला हुआ था । सभी गोप-गोपी और देवगण भगवान श्रीराधाकृष्ण को न पाकर विलाप करते हुए उनसे पुन: प्रकट होने की प्रार्थना करने लगे ।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने आकाशवाणी द्वारा कहा—‘मैं सर्वात्मा श्रीकृष्ण और मेरी स्वरूपाशक्ति श्रीराधा—हम दोनों ने ही भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए यह जलमय विग्रह (नीराकार स्वरूप) धारण कर लिया है ।’

यदि कोई मनुष्य गंगा का जल हाथ में लेकर प्रतिज्ञा करेगा और फिर उस अपनी की हुई प्रतिज्ञा का पालन नहीं करेगा वह नरक का भागी होगा ।

वे ही पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण और राधा जलरूप होकर गंगा बन गए और वह दिव्य जलराशि ही ‘देवनदी’ गंगा के नाम से प्रसिद्ध हुई । गोलोक से प्रकट होने वाली गंगा का यही रहस्य है ।

श्रीमद्देवीभागवत में गंगा के ब्रह्मद्रव रूप में आविर्भाव की कथा!!!!!!

दक्षकन्या सती के देहत्याग करने पर जब भगवान शिव तप करने लगे, तब देवताओं ने जगन्माता की स्तुति कर उनसे दोबारा भगवान शंकर का वरण करने की प्रार्थना की । देवी ने तब प्रसन्न होकर कहा—‘मैं दो रूपों में पर्वतराज हिमालय और मैना के घर प्रकट होऊंगी ।’ पहले वे अपने अंश रूप से वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को गंगा रूप में प्रकट हुईं फिर पूर्णावतार धारणकर पार्वती के रूप में प्रकट हुईं ।

हिमालय के घर में सती का अंशावतार गंगा के रूप में प्रकट होने पर ब्रह्मा आदि देवताओं ने सोचा कि सती के छायाशरीर को लेकर जब शिवजी ताण्डव कर रहे थे तो उनके पैरों के आघात से पृथ्वी रसातल में जाने लगी । जगत की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने चक्र से छायासती के शरीर के टुकड़े कर दिए थे, उस अपराध के कारण भगवान शिव अभी तक हमसे रुष्ट हैं । यदि हम गंगा को शिवजी को प्रदान कर दें तो वे हमसे अवश्य प्रसन्न हो जाएंगे । जैसे छायासती भगवान शिव के सिर पर स्थित रहीं वैसे ही ये गंगा जलरूप में उनके सिर पर सुशोभित रहेंगी ।
डॉ0 विजय शंकर मिश्र:

गंगा की ब्रह्मलोक से भूलोक तक की यात्रा!!!!!!

ब्रह्माजी सहित सभी देवगण हिमालय के घर गंगा को मांगने के लिए पहुंच गए और उन्हें सारी बात बता दी । गिरिसुता गंगा पिता की आज्ञा से सदाशिव को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए ब्रह्माजी के कमण्डलु में निराकार रूप से स्थित हो कर स्वर्गलोक में आ गयीं । जब उनकी माता मैना को यह बात पता चली तो उन्होंने गुस्से में शाप देते हुए कहा—‘माता से बिना बात किए तुम स्वर्ग चलीं गयीं, इसलिए तुम्हें जलरूप में पुन: पृथ्वी पर आना होगा ।’

ब्रह्माजी ने मूर्तिमान गंगा को शंकरजी को दे दिया और वे शंकरजी के साथ कैलास चली गयीं । ब्रह्माजी की प्रार्थना पर एक अंश से वे निराकार रूप में उनके कमण्डलु में स्थित हो गयीं और ब्रह्माजी उन्हें ब्रह्मलोक में ले गए ।

गंगा के शंकरजी के साथ विवाह की बात सुनकर भगवान विष्णु ने उन्हें वैकुण्ठ में बुलाया । भगवान शंकर गंगाजी सहित वैकुण्ड में पधारे । भगवान विष्णु के आग्रह पर वे सुन्दर पदों का गान करने लगे । वे जो रागिनी गाते वही मूर्तिमान होकर प्रकट हो जाती ।

भगवान शंकर के गायन से भगवान विष्णु हुए द्रवरूप!!!!!!

भगवान शंकर के ‘श्री’ नामक रागिनी के गाने से मुग्ध होकर भगवान विष्णु स्वयं रसरूप होकर बहने लगे । ब्रह्माजी ने देखा कि स्वयं ब्रह्म भी इस समय द्रवीभूत हो गए हैं; अत: उन्होंने वह जल भी अपने कमण्डलु में रख लिया । ब्रह्मद्रव से कमण्डलु के जल का स्पर्श होते ही सारा जल गंगाजी में मिल गया और निराकारा गंगाजी जलमयी हो गयीं ।

इसके बाद वामन अवतार में जब भगवान विष्णु ने विराट् रूप धारण कर अपने एक पग से बलि की सारी पृथ्वी नाप ली, शरीर से आकाश और भुजाओं से दिशाएं घेर लीं, दूसरे पग से उन्होंने स्वर्ग को भी नाप लिया, तब भगवान द्वारा उठाया गया चरण महर्लोक, जनलोक और तपलोक को पारकर सत्यलोक में पहुंच गया ।

उनके उठे हुए चरण के अंगूठे के नख से ब्रह्माण्ड फट गया । वहां से निकले जल को ब्रह्माजी ने अपने कमण्डलु में ले लिया। ब्रह्माजी ने कमण्डलु के उसी जल से भगवान के चरण को स्नान कराया। कमण्डलु का जल देते ही वह चरण वहीं स्थिर हो गया । ब्रह्मा के कमण्डलु का वही जल विष्णुजी के पांव पखारने से गंगा के रूप में परिणत हो गया और वे ‘विष्णुपदी’, ‘नारायणी’, ‘वैष्णवी’ व ‘सुरसरि’ नाम से भी जानी जाने लगीं ।

गंगा का मूल मन्त्र है—‘ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नम: ‘ अर्थात् विष्णु सभी देवों का प्रतिनिधित्व करते हैं और नारायणी गंगा भगवान विष्णु का ।
डॉ0 विजय शंकर मिश्र:

भगवान शंकर बन गए ‘गंगाधर’!!!!!!

अंत में भागीरथ की तपस्या के फलस्वरूप गंगा का अवतरण जब धरती पर होने लगा तो उस समय का बहुत ही सुन्दर वर्णन भगवान व्यासजी ने महाभारत के वनपर्व में किया है—

‘शंकरजी अपनी जटा फैलाकर खड़े हैं । शंकरजी को खड़े देखकर आकाश से एकाएक गंगाजी गिरीं । उनमें बहुत-सी मछलियां और घड़ियाल खलबलाहट पैदा कर रहे थे । आकाश में करधनी सी मालूम पड़ने वाली उस गंगा को शंकरजी ने सिर पर यों धारण किया, जैसे मोती की माला धारण की हो ।’

भगवान के चरणों तक पहुंचाने वाली शक्ति का नाम है गंगा!!!!!

गंगा शिवजी की जटाओं में बस गयीं और उसमें से बाहर न निकल सकी । राजा भगीरथ की प्रार्थना पर शिवजी ने जब अपनी जटा का एक बाल खोलकर गंगा को बाहर निकाला तो लोकमंगल को उतावली गंगा भगीरथ के रथ के पीछे चल पड़ीं और कपिलमुनि के आश्रम में जाकर राजा सगर के भस्मसात् पुत्रों को जैसे ही गंगाजी ने स्पर्श किया वे मुक्त होकर स्वर्ग पहुंच गए ।

भगवान विष्णु के पद (चरण) से निकली गंगा भगवान विष्णु के पद (लोक) को ही प्रदान कर देती हैं ।

गंगा, गीता, गायत्री, गणपति, गौरि, गुपाल ।
प्रातकाल जो नर भजैं, ते न परैं भव-जाल ।।

यह क्षण भी कट जाएगा

*🌷यह क्षण भी कट जाएगा🌷*

*एक बार एक राजा की सेवा से प्रसन्न होकर एक साधू नें उसे एक ताबीज दिया और कहा की राजन इसे अपने गले मे डाल लो और जिंदगी में कभी ऐसी परिस्थिति आये की जब तुम्हे लगे की बस अब तो सब ख़तम होने वाला है,*

*परेशानी के भंवर मे अपने को फंसा पाओ, कोई प्रकाश की किरण नजर ना आ रही हो, हर तरफ निराशा और हताशा हो तब तुम इस ताबीज को खोल कर इसमें रखे कागज़ को पढ़ना, उससे पहले नहीं।*

*राजा ने वह ताबीज अपने गले मे पहन लिया !*

*एक बार राजा अपने सैनिकों के साथ शिकार करने घने जंगल मे गया!*

*एक शिकार का पीछा करते करते राजा अपने सैनिकों से अलग हो गया और दुश्मन राजा की सीमा मे प्रवेश कर गया,*

*घना जंगल और सांझ का समय, तभी कुछ दुश्मन सैनिकों के घोड़ों की टापों की आवाज राजा को आई और उसने भी अपने घोड़े को एड लगाई,*

*राजा आगे आगे दुश्मन सैनिक पीछे पीछे! बहुत दूर तक भागने पर भी राजा उन सैनिकों से पीछा नहीं छुडा पाया !*

*भूख प्यास से बेहाल राजा को तभी घने पेड़ों के बीच मे एक गुफा सी दिखी, उसने तुरंत स्वयं और घोड़े को उस गुफा की आड़ मे छुपा लिया! और सांस रोक कर बैठ गया,*

*दुश्मन के घोड़ों के पैरों की आवाज धीरे धीरे पास आने लगी !*

*दुश्मनों से घिरे हुए अकेले राजा को अपना अंत नजर आने लगा, उसे लगा की बस कुछ ही क्षणों में दुश्मन उसे पकड़ कर मौत के घाट उतार देंगे! वो जिंदगी से निराश हो ही गया था, की उसका हाथ अपने ताबीज पर गया और उसे साधू की बात याद आ गई!*

*उसने तुरंत ताबीज को खोल कर कागज को बाहर निकाला और पढ़ा! उस पर्ची पर लिखा था —*
*“यह क्षण भी कट जाएगा”*

*राजा को अचानक ही जैसे घोर अन्धकार मे एक ज्योति की किरण दिखी, डूबते को जैसे कोई सहारा मिला ! उसे अचानक अपनी आत्मा मे एक अकथनीय शान्ति का अनुभव हुआ !*

*उसे लगा की सचमुच यह भयावह समय भी कट ही जाएगा, फिर मे क्यों चिंतित होऊं !*

*अपने प्रभु और अपने पर विश्वासरख उसने स्वयं से कहा की हाँ, यह भी कट जाएगा और हुआ भी यही, दुश्मन के घोड़ों के पैरों की आवाज पास आते आते दूर जाने लगी, कुछ समय बाद वहां शांति छा गई!*

*राजा रात मे गुफा से निकला और किसी तरह सकुशल अपने राज्य मे वापस आ गया*

*यह सिर्फ किसी राजा की कहानी नहीं है*

*यह हम सब की कहानी है ! हम सभी परिस्थिति, काम, तनाव के दवाव में इतने जकड जाते हैं की हमे कुछ सूझता नहीं है,*

*हमारा डर हम पर हावी होने लगता है, कोई रास्ता, समाधान दूर दूर तक नजर नहीं आता, लगने लगता है की बस, अब सब ख़तम,*

*है ना ?*

*जब ऐसा हो तो २ मिनट शांति से बेठिये, थोड़ी गहरी गहरी साँसे लीजिये ! अपने आराध्य को याद कीजिये और स्वयं से जोर से कहिये –यह समय भी कट जाएगा !*

*आप देखिएगा एकदम से जादू सा महसूस होगा, और आप उस परिस्थिति से उबरने की शक्ति अपने अन्दर महसूस करेंगे*

*सकारात्मक सोचे । अपने आप पर भरोसा रखे ।* *स्वस्थ रहै मस्त रहे*

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*🙏जय श्री राम ~ जय श्री कृष्णा🙏*

विष्णु_जी_के_छठे_अवतार

#विष्णु_जी_के_छठे_अवतार
#भगवान_परशुराम_जी_की_जय_जय_कार
मुंबई-गोवा नेशनल हाईवे 17 के बीच एक छोटा सा गांव आता है पिथे परशुराम। चिपलून से 10 किमी की दूरी पर स्थित इस गांव को भगवान परशुराम का गांव कहते हैं। बताया जाता है कि यह वही जगह है जहां समंदर को पीछे करने के लिए भगवान परशुराम ने अपना फरसा फेंका था। इस गांव के पास 10 किमी की दूरी पर मौजूद चिपलुन को परशुराम की भूमि कहा जाता है।
भगवान परशुराम ने अपने गुरु को अपनी पूरी भूमि दान कर दी। उस वक्त पश्चिमी घाट पर समंदर का पानी चढ़ रहा था। परशुराम ने भगवान वरुण से कोंकण और मालाबार से पानी हटाने कहा, लेकिन वो नहीं माने।
– इस बात से गुस्साए परशुराम जी ने समुन्दर पर अपना फरसा फेंका। परशुराम जी के गुस्‍से से भयभीत समुद्र ने अपने को पीछे खींच लिया।
जहां फरसा गिरा वह स्‍थान परशुराम ने अपने निवास के लिए चुन लिया। आज यह जगह पिथे परशुराम के नाम से जानी जाती है। यहां करीब 300 साल पुराना भगवान परशुराम का मंदिर है। जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण ब्रह्मेन्द्र स्वामी ने किया था। इस मंदिर के ठीक पीछे माता रेणुका का भी मंदिर है। परशुराम मंदिर परिसर में एक हनुमान मंदिर भी है जिसे समर्थ रामदास स्वामी ने बनवाया था। कैसे पहुंचे परशुराम गांव… By Air :- परशुराम गांव पहुंचने के लिए आपको चिपलुन पहुंचना जरुरी है। चिपलुन से सबसे नजदीकी पुणे का लोहेगांव एयरपोर्ट है, जो यहां से 117 किमी की दूरी पर है,,इसके अलावा दूसरा नजदीकी मुंबई एयरपोर्ट है, जो 184 किमी दूर है। एयरपोर्ट से आप टैक्सी, ट्रेन या बस के जरिए पहुंच सकते हैं। By Road:
सड़क मार्ग से चिपलुन मुंबई से 320 किमी की दूरी पर है। यह जगह मुंबई- गोवा हाईवे (NH-17) के बीच पड़ती है। इस रूट पर आपको कई प्राइवेट और सरकारी बसें आसानी से मिल जाएगी। ★ भगवान परशुराम जी जय

विष्णु_जी_के_छठे_अवतार

#विष्णु_जी_के_छठे_अवतार
#भगवान_परशुराम_जी_की_जय_जय_कार
मुंबई-गोवा नेशनल हाईवे 17 के बीच एक छोटा सा गांव आता है पिथे परशुराम। चिपलून से 10 किमी की दूरी पर स्थित इस गांव को भगवान परशुराम का गांव कहते हैं। बताया जाता है कि यह वही जगह है जहां समंदर को पीछे करने के लिए भगवान परशुराम ने अपना फरसा फेंका था। इस गांव के पास 10 किमी की दूरी पर मौजूद चिपलुन को परशुराम की भूमि कहा जाता है।
भगवान परशुराम ने अपने गुरु को अपनी पूरी भूमि दान कर दी। उस वक्त पश्चिमी घाट पर समंदर का पानी चढ़ रहा था। परशुराम ने भगवान वरुण से कोंकण और मालाबार से पानी हटाने कहा, लेकिन वो नहीं माने।
– इस बात से गुस्साए परशुराम जी ने समुन्दर पर अपना फरसा फेंका। परशुराम जी के गुस्‍से से भयभीत समुद्र ने अपने को पीछे खींच लिया।
जहां फरसा गिरा वह स्‍थान परशुराम ने अपने निवास के लिए चुन लिया। आज यह जगह पिथे परशुराम के नाम से जानी जाती है। यहां करीब 300 साल पुराना भगवान परशुराम का मंदिर है। जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण ब्रह्मेन्द्र स्वामी ने किया था। इस मंदिर के ठीक पीछे माता रेणुका का भी मंदिर है। परशुराम मंदिर परिसर में एक हनुमान मंदिर भी है जिसे समर्थ रामदास स्वामी ने बनवाया था। कैसे पहुंचे परशुराम गांव… By Air :- परशुराम गांव पहुंचने के लिए आपको चिपलुन पहुंचना जरुरी है। चिपलुन से सबसे नजदीकी पुणे का लोहेगांव एयरपोर्ट है, जो यहां से 117 किमी की दूरी पर है,,इसके अलावा दूसरा नजदीकी मुंबई एयरपोर्ट है, जो 184 किमी दूर है। एयरपोर्ट से आप टैक्सी, ट्रेन या बस के जरिए पहुंच सकते हैं। By Road:
सड़क मार्ग से चिपलुन मुंबई से 320 किमी की दूरी पर है। यह जगह मुंबई- गोवा हाईवे (NH-17) के बीच पड़ती है। इस रूट पर आपको कई प्राइवेट और सरकारी बसें आसानी से मिल जाएगी। ★ भगवान परशुराम जी जय

आज का हिन्दू पंचांग दिनांक 29 सितम्बर 2021

🌞 ~ *आज का हिन्दू पंचांग* ~ 🌞
⛅ *दिनांक 29 सितम्बर 2021*
⛅ *दिन – बुधवार*
⛅ *विक्रम संवत – 2078 (गुजरात – 2077)*
⛅ *शक संवत -1943*
⛅ *अयन – दक्षिणायन*
⛅ *ऋतु – शरद*
⛅ *मास -अश्विन (गुजरात एवं महाराष्ट्र के अनुसार – भाद्रपद)*
⛅ *पक्ष – कृष्ण*
⛅ *तिथि – अष्टमी रात्रि 08:30 तक तत्पश्चात नवमी*
⛅ *नक्षत्र – आर्द्रा रात्रि 11:26 तक तत्पश्चात पुनर्वसु*
⛅ *योग – वरीयान् शाम 06:35 तक तत्पश्चात परिघ*
⛅ *राहुकाल – दोपहर 12:29 से दोपहर 01:59 तक*
⛅ *सूर्योदय – 06:30*
⛅ *सूर्यास्त – 18:27*
⛅ *दिशाशूल – उत्तर दिशा में*
⛅ *व्रत पर्व विवरण – बुधवारी अष्टमी (सूर्योदय से रात्रि 08:30 तक), अष्टमी का श्राद्ध*
💥 *विशेष – अष्टमी को नारियल का फल खाने से बुद्धि का नाश होता है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*
🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞

🌷 *बुधवारी अष्टमी* 🌷
➡ *29 सितम्बर 2021 बुधवार को (सूर्योदय से रात्रि 08:30 तक) बुधवारी अष्टमी है ।*
👉🏻 *मंत्र जप एवं शुभ संकल्प हेतु विशेष तिथि*
🙏🏻 *सोमवती अमावस्या, रविवारी सप्तमी, मंगलवारी चतुर्थी, बुधवारी अष्टमी – ये चार तिथियाँ सूर्यग्रहण के बराबर कही गयी हैं।*
🙏🏻 *इनमें किया गया जप-ध्यान, स्नान , दान व श्राद्ध अक्षय होता है। (शिव पुराण, विद्येश्वर संहिताः अध्याय 10)*
🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞

🌷 *पुष्य नक्षत्र योग* 🌷
➡ *30 सितम्बर 2021 गुरुवार को (रात्रि 01:33 (अर्थात 01:33AM से 01 अक्टूबर सूर्योदय तक) गुरुपुष्यामृत योग है ।*
🙏🏻 *१०८ मोती की माला लेकर जो गुरुमंत्र का जप करता है, श्रद्धापूर्वक तो २७ नक्षत्र के देवता उस पर खुश होते हैं और नक्षत्रों में मुख्य हैं पुष्य नक्षत्र, और पुष्य नक्षत्र के स्वामी हैं देवगुरु ब्रहस्पति | पुष्य नक्षत्र समृद्धि देनेवाला है, सम्पति बढ़ानेवाला है | उस दिन ब्रहस्पति का पूजन करना चाहिये | ब्रहस्पति को तो हमने देखा नहीं तो सद्गुरु को ही देखकर उनका पूजन करें और मन ही मन ये मंत्र बोले –*
*ॐ ऐं क्लीं ब्रहस्पतये नम : |…… ॐ ऐं क्लीं ब्रहस्पतये नम : |*
🙏🏻
🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞

🌷 *कैसे बदले दुर्भाग्य को सौभाग्य में* 🌷
🌳 *बरगद के पत्ते पर गुरुपुष्य या रविपुष्य योग में हल्दी से स्वस्तिक बनाकर घर में रखें |*
🙏🏻
🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞

🌷 *रविपुष्यामृत योग* 🌷
🙏🏻 *‘शिव पुराण’ में पुष्य नक्षत्र को भगवान शिव की विभूति बताया गया है | पुष्य नक्षत्र के प्रभाव से अनिष्ट-से-अनिष्टकर दोष भी समाप्त और निष्फल-से हो जाते हैं, वे हमारे लिए पुष्य नक्षत्र के पूरक बनकर अनुकूल फलदायी हो जाते हैं | ‘सर्वसिद्धिकर: पुष्य: |’ इस शास्त्रवचन के अनुसार पुष्य नक्षत्र सर्वसिद्धिकर है | पुष्य नक्षत्र में किये गए श्राद्ध से पितरों को अक्षय तृप्ति होती है तथा कर्ता को धन, पुत्रादि की प्राप्ति होती है |*
🙏🏻 *इस योग में किया गया जप, ध्यान, दान, पुण्य महाफलदायी होता है परंतु पुष्य में विवाह व उससे संबधित सभी मांगलिक कार्य वर्जित हैं | (शिव पुराण, विद्येश्वर संहिताः अध्याय 10)*

🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞
🙏🍀🌻🌹🌸💐🍁🌷🌺🙏🚩🚩 *” ll जय श्री राम ll “* 🚩🚩

आज का हिन्दू पंचांग दिनांक 29 सितम्बर 2021

🌞 ~ *आज का हिन्दू पंचांग* ~ 🌞
⛅ *दिनांक 29 सितम्बर 2021*
⛅ *दिन – बुधवार*
⛅ *विक्रम संवत – 2078 (गुजरात – 2077)*
⛅ *शक संवत -1943*
⛅ *अयन – दक्षिणायन*
⛅ *ऋतु – शरद*
⛅ *मास -अश्विन (गुजरात एवं महाराष्ट्र के अनुसार – भाद्रपद)*
⛅ *पक्ष – कृष्ण*
⛅ *तिथि – अष्टमी रात्रि 08:30 तक तत्पश्चात नवमी*
⛅ *नक्षत्र – आर्द्रा रात्रि 11:26 तक तत्पश्चात पुनर्वसु*
⛅ *योग – वरीयान् शाम 06:35 तक तत्पश्चात परिघ*
⛅ *राहुकाल – दोपहर 12:29 से दोपहर 01:59 तक*
⛅ *सूर्योदय – 06:30*
⛅ *सूर्यास्त – 18:27*
⛅ *दिशाशूल – उत्तर दिशा में*
⛅ *व्रत पर्व विवरण – बुधवारी अष्टमी (सूर्योदय से रात्रि 08:30 तक), अष्टमी का श्राद्ध*
💥 *विशेष – अष्टमी को नारियल का फल खाने से बुद्धि का नाश होता है।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)*
🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞

🌷 *बुधवारी अष्टमी* 🌷
➡ *29 सितम्बर 2021 बुधवार को (सूर्योदय से रात्रि 08:30 तक) बुधवारी अष्टमी है ।*
👉🏻 *मंत्र जप एवं शुभ संकल्प हेतु विशेष तिथि*
🙏🏻 *सोमवती अमावस्या, रविवारी सप्तमी, मंगलवारी चतुर्थी, बुधवारी अष्टमी – ये चार तिथियाँ सूर्यग्रहण के बराबर कही गयी हैं।*
🙏🏻 *इनमें किया गया जप-ध्यान, स्नान , दान व श्राद्ध अक्षय होता है। (शिव पुराण, विद्येश्वर संहिताः अध्याय 10)*
🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞

🌷 *पुष्य नक्षत्र योग* 🌷
➡ *30 सितम्बर 2021 गुरुवार को (रात्रि 01:33 (अर्थात 01:33AM से 01 अक्टूबर सूर्योदय तक) गुरुपुष्यामृत योग है ।*
🙏🏻 *१०८ मोती की माला लेकर जो गुरुमंत्र का जप करता है, श्रद्धापूर्वक तो २७ नक्षत्र के देवता उस पर खुश होते हैं और नक्षत्रों में मुख्य हैं पुष्य नक्षत्र, और पुष्य नक्षत्र के स्वामी हैं देवगुरु ब्रहस्पति | पुष्य नक्षत्र समृद्धि देनेवाला है, सम्पति बढ़ानेवाला है | उस दिन ब्रहस्पति का पूजन करना चाहिये | ब्रहस्पति को तो हमने देखा नहीं तो सद्गुरु को ही देखकर उनका पूजन करें और मन ही मन ये मंत्र बोले –*
*ॐ ऐं क्लीं ब्रहस्पतये नम : |…… ॐ ऐं क्लीं ब्रहस्पतये नम : |*
🙏🏻
🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞

🌷 *कैसे बदले दुर्भाग्य को सौभाग्य में* 🌷
🌳 *बरगद के पत्ते पर गुरुपुष्य या रविपुष्य योग में हल्दी से स्वस्तिक बनाकर घर में रखें |*
🙏🏻
🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞

🌷 *रविपुष्यामृत योग* 🌷
🙏🏻 *‘शिव पुराण’ में पुष्य नक्षत्र को भगवान शिव की विभूति बताया गया है | पुष्य नक्षत्र के प्रभाव से अनिष्ट-से-अनिष्टकर दोष भी समाप्त और निष्फल-से हो जाते हैं, वे हमारे लिए पुष्य नक्षत्र के पूरक बनकर अनुकूल फलदायी हो जाते हैं | ‘सर्वसिद्धिकर: पुष्य: |’ इस शास्त्रवचन के अनुसार पुष्य नक्षत्र सर्वसिद्धिकर है | पुष्य नक्षत्र में किये गए श्राद्ध से पितरों को अक्षय तृप्ति होती है तथा कर्ता को धन, पुत्रादि की प्राप्ति होती है |*
🙏🏻 *इस योग में किया गया जप, ध्यान, दान, पुण्य महाफलदायी होता है परंतु पुष्य में विवाह व उससे संबधित सभी मांगलिक कार्य वर्जित हैं | (शिव पुराण, विद्येश्वर संहिताः अध्याय 10)*

🌞 *~ हिन्दू पंचांग ~* 🌞
🙏🍀🌻🌹🌸💐🍁🌷🌺🙏🚩🚩 *” ll जय श्री राम ll “* 🚩🚩

अशा अधिकाऱ्यांना तुरुंगात टाकायला हवं” सुप्रीम कोर्टाने अटकेपासून संरक्षण मागणाऱ्या अधिकाऱ्याला सुनावलं

👉👉“अशा अधिकाऱ्यांना तुरुंगात टाकायला हवं”; 👉सुप्रीम कोर्टाने अटकेपासून संरक्षण मागणाऱ्या अधिकाऱ्याला सुनावलं*

*नवी दिल्ली – पोलीस अधिकारी सत्तेत असलेल्या राजकीय पक्षाची बाजू घेतात आणि त्यांच्या विरोधकांवर कारवाई करतात. नंतर विरोधक सत्तेवर आल्यावर पोलीस अधिकाऱ्यांवर कारवाई करतात. या परिस्थितीसाठी खुद्द पोलीस खात्यालाच जबाबदार धरायला हवे, असंही कोर्टाने म्हटलंय.*

*👉छत्तीसगढ सरकारने दाखल केलेल्या बेहिशेबी मालमत्ता आणि राजद्रोहाच्या प्रकरणात अटकविरोधात निलंबित आयपीएस अधिकारी गुरजिंदर पाल सिंग यांच्या याचिकेवर सुप्रीम कोर्टात सुनावणी पार पडली. याप्रकरणी अटकेपासून अंतरिम संरक्षण देताना सुप्रीम कोर्टाने मोठ वक्तव्य केलं आहे. “केवळ तुम्ही सरकारच्या जवळ असल्यामुळे तुम्ही पैसे वसुलण्यास सुरुवात केली. तुम्ही सरकारच्या जवळ असाल आणि या गोष्टी करत असाल तर एक दिवस तुम्हाला त्याची व्याजासह परतफेड करावी लागेल. तुम्ही प्रत्येक बाबतीत सुरक्षा मागू शकत नाही,” असं सरन्यायाधीश एनव्ही रमण यांनी म्हटलंय. “हे खूप जास्त होतंय, अशा अधिकाऱ्यांना आपण सुरक्षा का द्यायची? देशात हा एक नवीन ट्रेंड होतोय, अशा अधिकाऱ्यांना तर तुरुंगात टाकायला हवं” असंही सरन्यायाधीश म्हणाले.*

*👉दरम्यान, त्यांनी निलंबित एडीपी गुरजिंदर पाल अटकेपासून अंतरिम संरक्षण दिले आहे. तसेच, छत्तीसगड सरकारला नोटीस जारी करून संपूर्ण प्रकरणाची सुनावणी १ ऑक्टोबर रोजी निश्चित केली आहे. गेल्या सुनावणीत सर्वोच्च न्यायालयाने सत्ताधारी पक्षांशी पोलीस अधिकाऱ्यांच्या संबंधाबद्दल चिंता व्यक्त केली होती. तसेच हा देशातील त्रासदायक ट्रेंड असल्याचं मत सीजेआय रमण यांनी व्यक्त केलं होतं.*

*👉“पोलीस अधिकारी सत्तेत असलेल्या राजकीय पक्षाची बाजू घेतात आणि त्यांच्या विरोधकांवर कारवाई करतात. नंतर विरोधक सत्तेवर आल्यावर पोलीस अधिकाऱ्यांवर कारवाई करतात. या परिस्थितीसाठी खुद्द पोलीस खात्यालाच जबाबदार धरायला हवे. त्यांनी कायद्यानुसार काम करायला हवं,” असं छत्तीसगडचे निलंबित अतिरिक्त पोलीस महासंचालक गुरजिंदर पाल सिंह यांच्या याचिकेवर सुनावणी करताना म्हटलंय. परंतु, राजद्रोहाच्या प्रकरणात पोलीस त्यांना अटक करणार नाहीत, असा तात्पुरता दिलासा दिला.*

कृषीकिंग मोबाईलऑटोस्वीच

😲 कृषीकिंग मोबाईलऑटोस्वीच 😲

_*कँश ऑन डिलीव्हरी उपलब्ध*_

_*संपर्क:९७६६३७६२३५_
_*काँल टाईम : सकाळी ९ ते संध्याकाळी ५*_

🔍 _* मोबाईल ऑटोस्वीच ची वैशिष्ट्ये:”*_

📲तुम्हाला तुमच्या मोबाईलवरून फोन करून अथवा मेसेज करून जगाच्या कोणत्याही ठिकाणाहून मोटरपंप चालू अथवा बंद करता येतो तसेच आता मोटरपंप चालू आहे की बंद आहे याची स्थिती जाणून घेता येते.
📲विहिरीतील किंवा बोरमधील पाणी संपल्यानंतर (ड्रायरन झाल्यानंतर) मोटरपंप आपोआप बंद केला जातो आणि तुम्हाला फोन/मेसेज करून मोटरपंप बंद केल्याचे कळवले जाते

🚰 *ड्रायरन मोड:*
(१)ड्रायरन झाल्यानंतर एका विशिष्ट वेळानंतर मोटरपंप आपोआप चालू होईल याचे सेटिंग करता येते.
(२)ड्रायरन झाल्यानंतर फ्युज/सप्लाय जाऊन आल्यानंतर मोटरपंप आपोआप चालू होईल याचे सेटिंग करता येते.
(३)एकदा ड्रायरन झाल्यानंतर जोपर्यंत मोबाईलवरून मोटरपंप चालू केला जात नाही तोपर्यंत मोटरपंप
बंद राहील याचे सेटिंग करता येते.

⏰ *टाइमर मोड:*
(१)मोटरपंप एका विशिष्ट वेळेकरता चालू ठेवता येतो
उदा. १मिनिट,२मि……..२४तास.
(२)मोटरपंप घड्याळाच्या वेळेनुसार एका विशिष्ट वेळेकरता चालू ठेवता येतो.
उदा. रात्री ११:०० ते पहाटे ०३:००
(३)सायक्लीक टाइमर १ मिनीटापासून २४ तासांपर्यंत सेट करता येतो.
उदा. मोटरपंप १० मिनिटे चालू आणि १ तास बंद आणि पुन्हा १० मिनिटे चालू आणि १ तास बंद असा चालवता येतो.

⛓ *कनेक्शन फॉल्ट:*
कनेक्शन मध्ये कोणताही बिघाड असेल जसे की मोटरला जाणारी वायर तुटलेली असणे, स्टार्टरमधील रिले ओव्हरलोड झालेला असणे किंवा मोबाइल ऑटोच्या वायर चुकीच्या ठिकाणी जोडलेल्या असणे इ., तर मोटरपंप चालू करतेवेळीच तसे वापरकर्त्याला कळवले जाते.

📞 *अलर्ट:
मोबाईल ऑटोस्विच” चक्क तुमच्याशी आवाजात बोलतो.
📲मोबाइल न वापरता स्टार्टरवरून जर मोटरपंप कोणी चालू/बंद केला तर युझरला तसे अलर्ट केले जाते.
📲सप्लाय व्यवस्थित आल्यानंतर मोटरपंप आपोआप सुरू करायचा की वापरकर्त्याला कॉल/मेसेज करून मोटरपंप सुरू करण्यासंबंधी विचारायचे, याचे सेटिंग तुम्हाला अगोदरच करून ठेवता येते.
📲फ्यूज गेल्यानंतर, सप्लाय सुरळीत आल्यानंतर, मोटरपंप चालू/बंद झाल्यानंतर तुम्हाला फोनद्वारे कॉल/मेसेज करून तसे कळवले जाते.
📲रजिस्टर केलेल्या ९ मोबाईल नंबरपैकी ज्या नंबरवरून सर्वात शेवटी कॉल/मेसेज आला होता त्या नंबरच्या मोबाईलवर अलर्ट पाठविले जातात.
📲”मोबाईल ऑटोस्विच” कडून येणारा अलर्ट कॉल असावा की मेसेज हे तुम्हाला ठरवता येते.
📲मोबाईल ऑटोस्विच” कडून येणारे सर्व अलर्ट तुम्हाला चालू अथवा बंद करता येतात.

☎ *ट्रू-कॉलर:*
मोटरपंप, रजिस्टर केलेल्या नंबरवरूनच चालू/बंद व्हावा की कोणत्याही नंबरवरून चालू/बंद व्हावा हे तुम्हाला ठरवता येते.

💵 *बॅलन्स:*
📲मोबाईल ऑटोस्विचच्या सिमकार्ड मध्ये किती बॅलन्स आहे हे तुम्हाला तुमच्या मोबाईलवर मेसेजद्वारे कळवले जाते.
📲ऑटोस्विचच्या सिमकार्ड मध्ये एकही रुपये बॅलन्स नसेल तरी सिस्टिम चालते.

🔐 *सेक्युरिटी:*
📲जर तुमचा “मोबाईल ऑटोस्विच” चोरी झाला असेल तर काळजी करण्याचे कोणतेही कारण नाही, यामध्ये आहे “ट्रॅकर” आणि “डिव्हाइस लोकेशन” सुविधा. ज्यामुळे तुम्हाला समजेल आता तुमचा “मोबाईल ऑटोस्विच” पृथ्वीवर कुठे आहे आणि त्यामध्ये कोणत्या नंबरचे सिमकार्ड टाकले गेले आहे. याच माहितीचा उपयोग करून तुम्हाला तुमचा ऑटोस्विच शोधून काढता येईल.
📲सिस्टिम चोरी झाल्यानंतर जर तुम्ही “कृषीकिंग” कंपनीला कळवले तर चोरी झालेली सिस्टिम बंद करून ठेवता येते. बंद केलेली सिस्टिम वापरण्यायोग्य राहत नाही.
Balaji Dnyandeo Gore
(Embedded Software Developer. )
Krushiking Autoswitch.
Address:-laulkar At.shiral(Tembhurni)
Po. Tembhurni
Tal. Madha, Dist. Sholapur, 413211
Maharashtra.

📝 *गॅरंटी:*
📲6 महिने कोणताही बिघाड झाल्यास पीस टू पीस बदलून दिला जाईल.

संघटना और प्रेरणा

प्रेरणादायक:- संघटन

एक आदमी था, जो हमेशा अपने *संगठन (ग्रुप)* में सक्रिय रहता था, उसको सभी जानते थे ,बड़ा मान सम्मान मिलता था; अचानक किसी कारण वश वह निष्क्रिय रहने लगा , मिलना-जुलना बंद कर दिया और संगठन से दूर हो गया।

कुछ सप्ताह पश्चात् एक बहुत ही ठंडी रात में उस संगठन के मुखिया ने उससे मिलने का फैसला किया । मुखिया उस आदमी के घर गया और पाया कि आदमी घर पर अकेला ही था। एक सिगड़ी / बोरसी (अलाव) में जलती हुई लकड़ियों की लौ के सामने बैठा आराम से आग ताप रहा था। उस आदमी ने आगंतुक मुखिया का बड़ी खामोशी से स्वागत किया।

दोनों चुपचाप बैठे रहे। केवल आग की लपटों को ऊपर तक उठते हुए ही देखते रहे। कुछ देर के बाद मुखिया ने बिना कुछ बोले, उन अंगारों में से एक लकड़ी जिसमें लौ उठ रही थी (जल रही थी) उसे *उठाकर किनारे पर रख दिया।* और फिर से शांत बैठ गया।

मेजबान हर चीज़ पर ध्यान दे रहा था। लंबे समय से अकेला होने के कारण मन ही मन आनंदित भी हो रहा था कि वह आज अपने संगठन के मुखिया के साथ है। लेकिन उसने देखा कि अलग की हुई लकड़ी की आग की लौ धीरे धीरे कम हो रही है।* कुछ देर में आग बिल्कुल बुझ गई। उसमें कोई ताप नहीं बचा। उस लकड़ी से आग की चमक जल्द ही बाहर निकल गई।

कुछ समय पूर्व जो उस लकड़ी में *उज्ज्वल प्रकाश था और आग की तपन* थी वह अब एक काले और मृत टुकड़े से ज्यादा कुछ शेष न था।

इस बीच.. दोनों मित्रों ने एक दूसरे का बहुत ही संक्षिप्त अभिवादन किया, कम से कम शब्द बोले। जाने से पहले मुखिया ने *अलग की हुई बेकार लकड़ी को उठाया और फिर से आग के बीच में रख दिया। वह लकड़ी फिर से सुलग कर लौ बनकर जलने लगी और चारों ओर रोशनी तथा ताप बिखेरने लगी।*

जब आदमी, मुखिया को छोड़ने के लिए दरवाजे तक पहुंचा तो उसने मुखिया से *कहा मेरे घर आकर मुलाकात* करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।

*आज आपने बिना कुछ बात किए ही एक सुंदर पाठ पढ़ाया है कि अकेले व्यक्ति का कोई अस्तित्व नहीं होता, संगठन का साथ मिलने पर ही वह चमकता है और रोशनी बिखेरता है ; संगठन से अलग होते ही वह लकड़ी की भाँति बुझ जाता है।*

मित्रों संगठन या एक दूसरे के साथ से ही हमारी पहचान बनती है, इसलिए संगठन हमारे लिए सर्वोपरि होना चाहिए ।*

संगठन के प्रति हमारी निष्ठा और समर्पण किसी व्यक्ति के लिए नहीं, उससे जुड़े विचार के प्रति होनी चाहिए।

संगठन किसी भी प्रकार का हो सकता है , पारिवारिक , सामाजिक, व्यापारिक (शैक्षणिक संस्थान, औधोगिक संस्थान ) सांस्कृतिक इकाई , सेवा संस्थान , सोशल मीडिया , आदि।

*संगठनों के बिना मानव जीवन अधूरा है , अतः हर क्षेत्र में जहाँ भी रहें संगठित रहें !*

समस्त सदस्यों को समर्पित

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