Home आध्यात्मिक गायत्री का मंत्रार्थ* 

गायत्री का मंत्रार्थ* 

*गायत्री का मंत्रार्थ*

*ॐ’ की व्याख्या*

ॐकार को ब्रह्म कहा है। यह परमात्मा का स्वयं सिद्ध नाम है। योग विद्या के आचार्य समाधि अवस्था में पहुंच कर जब ब्रह्म का साक्षात्कार करते हैं तो उन्हें प्रकृति के उच्च अन्तराल में एक ध्वनि होती हुई परिलक्षित होती है। जैसे घड़ियाल में चोट मार देने से वह बहुत देर तक झनझनाती रहती है, इसी प्रकार बार बार एक ही कम्पन उन्हें सुनाई देते हैं। यह नाद ‘ॐ’ ध्वनि से मिलता जुलता होता है। उसे ही ऋषियों ने ईश्वर का स्वयं सिद्ध नाम बताया है और उसे ‘शब्दब्रह्म’ कहा है।
इस शब्द ब्रह्म से रूप बनता है। इस शब्द के कम्पन सीधे चलकर दाहिनी ओर मुड़ जाते हैं। शब्द अपने केन्द्र की धुरी पर भी घूमता है, इस प्रकार वह चारों ओर घूमता रहता है। इस भ्रमण, कम्पन, गति और मोड़ के आधार पर स्वस्तिक बनता है यह स्वस्तिक ॐकार का रूप।
ॐकार को प्रणव भी कहते हैं। यह समस्त मंत्रों का सेतु है क्योंकि इसी से समस्त शब्द और मंत्र बनते हैं। प्रणव से व्याहृतियां उत्पन्न हुई और व्याहृतियों में से वेदों का आविर्भाव हुआ।
इसी का कुछ विवेचन नीचे है—

*सर्वेषामेव मन्त्राणां कारणं प्रणवः स्मृतः ।*
*तस्मात् व्याहृतयो जातास्ताभ्यो वेदत्रयं तथा ।।*
—वृद्धहारीतिस्मृ0 अ0 6।88

ओंकार समस्त मन्त्रों का हेतुभूत है, ओंकार से व्याहृतियां उत्पन्न हुईं और व्याहृतियों से तीनों वेद उत्पन्न हुए।

*भूरित्येव हि ऋग्वेदो भुवः इति यजुस्तथा ।*
*स्युरीति सामवेदः स्यात् प्रणवो भूर्भुवः स्वः ।।*
—वृद्धहारीति अ0 6।89

भूः से ऋग्वेद, भुवः से युजुर्वेद, स्वः से सामवेद उत्पन्न हुआ और भूर्भुवः—ये प्रणव से उत्पन्न हुए।

*सप्तव्याहृतिषुप्रोक्तः प्रणवोऽयं पुनः पुनः ।*
*सप्तनामपि लोकानां शक्ति ब्रह्म स्वरूपताम् ।।*
—वहवृच सं0 मं0 दीपिका

यह ओंकार सातों व्याहृतियों में बारम्बार कहा गया है, अतः सप्तलोकों की ब्रह्म स्वरूपता का द्योतक है।

*तत्र सर्व वेदानाम् सारमस्ति ।*

हे नचिकेता ! ओ३म्, की साधना में ही समस्त वेदों का सार है।

*अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः ।*
*वेदत्रयान्निरहदू भूर्भुंवः स्वरितीति च ।।*
—मनु अ0 2।76

ब्रह्माजी ने अकार, उकार, मकार अर्थात् ओ३म् को और भूर्भुवः स्वः को तीन वेदों से निकाला था।

*ओंकारं विन्दु संयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः ।*
*कामदं मोक्षदं चैव ओंकाराय नमोनमः ।।*

योगी पुरुष अनुस्वार युक्त ओंकार का सदा ध्यान करते हैं, अतः समस्त कामनाओं की पूर्ति करने वाले तथा मोक्षदायक ओंकार को हम नमस्कार करते हैं।
ओंकार को अपनाने से ब्रह्म तत्वों की मात्रा अपने भीतर बढ़ती है। फलस्वरूप गुण कर्म स्वभाव में ब्राह्मी भावों की प्रधानता रहने लगती है। इस अभिवर्धन के फलस्वरूप मनुष्य स्वर्ग, मोक्ष, अमरता, सिद्धि, मंगल, निर्भयता, आत्मदर्शन, ब्रह्म निर्वाण, मनोजय, शिवत्व की ओर बढ़ता है। ईश्वर के इस स्वयं सिद्ध नाम का अवलम्बन ग्रहण करके मनुष्य ईश्वर की ओर ही चल पड़ता है। रस्सी को पकड़ कर चढ़ने वाला वहीं जा पहुंचा है जहां पर रस्सी बंधी है, प्रणव ब्रह्म संबद्ध है इस सम्बन्ध के आधार पर साधक ब्राह्मी स्थिति तक पहुंच जाता है। नीचे के प्रमाणों में इन्हीं भावों का प्रतिपादन किया गया है।

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